
शुक्रवार, 28 मार्च 2008
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गंगाकिनारे बैठा एक यायावर मन नदि की धार सी कितनी ही लम्बी यात्राओं के बाद भी आगे अनंत की ओर सदैव उन्मुख होता है. समय की अजान में विचरनेवाला यही यायावर कभी गंगा की अलौकिक सौन्दर्य में खो जाता तो कभी उसकी धारा में बहनेवाली संस्कृति की अजश्र तरंगों से एकात्म हो जाता है. वही मन बैठा गंगाकिनारे लौकिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक लहरों को जब शब्दों में पिरोता है तो एक अद्भुत सम्वाद बनता है. उसी सम्वाद का एक रूप यह ब्लोग भी है--------------