जिजीविषा की दूब
एक - से - एक
नायाब तरीकों से
उत्पीड़न, त्रास, यंत्रणा देकर
तब्दील कर दिया है
कुछ लोगों ने
यंत्रणा - शिविर में
देश को
दुहाई देते हुए
मूल्यों, उसूलों की
हवाले किया है दरिंदों को
करोड़ों की जिंदगी
तंगदिली, तंग दिमागी में
आकाओं ने बांधें हैं मंसूबे
रचा है चक्रव्यूह
जिसमें अभिमन्यु- सा कोई
अंतिम दम तक
लड़ कर भी
अभिशप्त है मरने को
निहत्थों पर वार करके
कराते हैं पहचान महारथी
अपने वीरत्व का
चाहते हैं वे जीत
किसी तरह
जीवन नहीं
लेकिन हरी हो उठती है
दब - कुचल कर भी
जिजीविषा की दूब
जीने के लिए फिर से !
शुक्रवार, 11 जनवरी 2008
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