शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

कविता

जिजीविषा की दूब

एक - से - एक
नायाब तरीकों से
उत्पीड़न, त्रास, यंत्रणा देकर
तब्दील कर दिया है
कुछ लोगों ने
यंत्रणा - शिविर में
देश को

दुहाई देते हुए
मूल्यों, उसूलों की
हवाले किया है दरिंदों को
करोड़ों की जिंदगी
तंगदिली, तंग दिमागी में

आकाओं ने बांधें हैं मंसूबे
रचा है चक्रव्यूह
जिसमें अभिमन्यु- सा कोई
अंतिम दम तक
लड़ कर भी
अभिशप्त है मरने को

निहत्थों पर वार करके
कराते हैं पहचान महारथी
अपने वीरत्व का

चाहते हैं वे जीत
किसी तरह
जीवन नहीं

लेकिन हरी हो उठती है
दब - कुचल कर भी
जिजीविषा की दूब
जीने के लिए फिर से !

2 टिप्‍पणियां:

कुमार नवीन ने कहा…

अशु जी,
नई रुपरेखा और नए कलेवर के साथ
आपका ब्‍लॉग अच्‍छा बन पड़ा है । "जिजीविषा
का दूब" में शीर्षक में संशोधन कर "जिजीविषा
की दूब" किया जाना अनिवार्य था । कविता की
प्रशंसा काव्‍य जगत में विचरने वाला प्रत्‍येक काव्‍य
प्रेमी निश्चित रुप से करेगा ।
मेरी शुभकामनाएं स्‍वीकारें -
कुमार नवीन

देवांशु वत्स ने कहा…

पापा,
आप की की सारी कविताओं को एक साथ देखना सुखद है !