गुरुवार, 31 जनवरी 2008

"साक्षी हैं शब्द " से

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साक्षी हैं शब्द

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॥समर्पण॥

माँ !

देखा नहीं था तुम्हें

नहीं उभरी कभी

तुम्हारी तस्वीर मन में

और कभी

प्रतीक्षा भी नहीं की

रहस्याविष्ट होकर

अदृश्य-सागर-तट पर

फिर भी

होश सम्भालने से लेकर

आज तक

हर पल

प्रत्येक रागात्मक सम्बन्ध में

महसूसता रहा हूँ

एक वत्सल-स्पर्श

ममता की छाँव

जब तेज

बहुत तेज धूप से

गुजरता हूँ

___________________________

॥कला-साधना॥

अन्धेरी घाटियों की

भूल-भुलैया में

मौत के भयंकर अज्दहों से

पंजा लड़ाता रहा

अकेला मैं

रक्त से लथपथ

हो गये मेरे हाथ-पाँव

थकता गया, हारता गया

रक्त के सैलाब में बहता गया मैं

लेकिन मेरी आँखें

सुदूर आकाश के

श्वेत-पुष्पों पर टंगी थीं

मौत की स्याह चादर में

ममता ढूँढता रहा माँ की

सौन्दर्य-किरणों के

कोमल-स्पर्श की

कामना करता रहा

आग के दरिया में

बहता रहा

लेकिन आँखें

किनारे पर खिले गुलाबों पर

टिकी रहीं

कई बार

मौत की बाँहे

खींच ले गयीं

अपनी गोद में

लेकिन मेरी आँखें

जीवन की कमनीय सौन्दर्य की

मोहकता आँकती रही

मुझे पुकारती रही मौत

और उसी की गोद में

दुबका मैं

जीवन तराशता रहा

यह रहस्यमय खेल

चलता रहा

मैं धीरे-धीरे गलता रहा

बर्फ सा

मौत की धीमी आँच में

हारता रहा मैं

लेकिन हार नहीं मानी

मरता रहा पर

मौत नहीं जानी

मीठी जहर-सी मौत

मुझे बहुत प्यार करती है

और, मुझे इससे नफरत है

इसी नफरत की आग में

प्रेम के उजले फूल

उगाता हूँ

मृत्यु की गोद में

जीवन के गीत गाता हूँ

_______________________

॥आत्मन॥

मत घेरो हमें

प्रवंचना की दीवारों से

प्रलोभन की लकीरों से

मत घेरो

शास्वत सत्य अपने

बन्द करो बक्सों में

और हमें जीने दो

जब कभी

सन्धि के दो क्षण

हमें नसीब हुए

छीन लिया तुमने वर्तमान

बदले में

दे दिया भविष्य

कह दिया-

समय अनंत, शाश्वत है

हम सब चिर कालिक हैं

और हम सह गये

छल, झूठ, प्रवंचना

छीन ले गये तुम

क्षण की पूजा

सुख की अर्चना

जब कभी एक क्षण

डूबने का आया

और हम डूबने ही वाले थे

कि तुमने हमें

बचा लिया

कहने लगे-

जीवन कभी मरता नहीं

तुम्हारे ज्ञान, विज्ञान, दर्शन

हमें घेरे रह गये

और हम लुट गये

हमसे वे छूट गये

जो हमें प्यारे थे

हमारा क्षण मर गया

और तुम जी गये

हमारा रक्त पीकर

ओ, रक्तबीज तुम !

कभी भूमा

कभी पुरुष सहस्त्रशीर्षा

अज्ञेय बन आते रहे

चुगते रहे

हमारे अमूल्य क्षण

और हम चुकते रहे

ओ सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात

पूछते हैं हम तुमसे

कहाँ है सत्य

और हमारा कालातीत फैलाव

क्यों तुम अमर

हमें कहते रहे

और हम मरते रहे

भविष्य के लिये ?

नहीं

अब हम

नहीं जियेंगे भविष्य,

सीमाबद्ध वर्त्तमान

यह जीवन हम

जियेंगे।

___________________________

॥झेलना॥

जबसे

जिन्दगी को झेलना

एक प्रक्रिया बन गया है

जीना कठिन हो गया है

लगता है

मरना भी कठिन हो गया है

डाल दी हैं बेड़ियाँ

उल्लास के पाँव में

आकाशोन्मुख भावों की गर्दन मरोड़ी है

हौसले पस्त हो गये हैं

होने और करने के बीच

लगता है

सब कुछ खो गया है

बार-बार कविता की गोद में

दुबकने की चाव

जीवन की गद्य में

पत्थार पर दूब की तरह

अधमरा हो जाता है

मरी हुई तितली को

बच्चों-सा

कागज पर चिपकाना

और खुश होना

नागवार गुजरता है

तब सोचता हूँ

क्या सब हो गया है?

___________________

॥हरियाली और रास्ता॥

तुम, मैं, बाकी सब

सराय में मिले ऐसे

सुबह सोते ही

आगे की यात्रा पर

चल पड़ेंगे

विदा !

आक्षितिज फैली हरियाली

प्रेयसी सी

बाँहें पसार

आँखों में आँखें डाल

रोकती बिलमाती हैं

आनन्द का स्वप्न

और स्वप्न का आनन्द

देने का भ्रम देकर

आगे जाने से

लेकिन लम्बा यह रास्ता

पैर छीन लेता है,

अपने दो हाथ

माँग लेती है रोजगार,

आँखों में नाचने लगती है

रोटी.

हरियाली की सहमी पुकार

रास्ते तक आती है,

फिर खो जाती है,

मैं बढ जाता हूं रास्ते पर

अजगर सा पड़ा है जो आगे.

___________________

ओह, सॉरी !॥

कल रात

ताश के पत्तों

और शराब के बीच

अचानक वह आये

थके, उदास, बैठे

बोले- राजन की

दुर्घटना हो गयी

मैं चुप रहा

सीमान्तक रेखा तक

खींच गयी झुँझलाहट

अस्पताल के चक्कर

दौड़-धूप की सोचकर

वह फिर बोले

थोड़ी देर में ही

वह मर गया

मैं चौंका

फिर बोला

ओह सॉरी !

संतोष बिछ गया मन पर

और पत्ते फेंटने लगा

___________________

॥सपना और सन्नाटा॥

इधर जो सपने आते हैं

सन्नाटा दे जाते हैं

सपने भी कैसे

धूसर, मटमैले

धूल भरी सड़क

सुनसान दुपहर

काले हहराते बादल

घर का सूना आंगन

द्वार पर अन्धेरा

चीखती बिल्लियां भौंकते कुत्ते

इन सबसे बढकर उदास सवेरा

बीमार, टहलती शाम !

कपड़े बदल बाहर निकलता हूँ

अन्धेरा घिरने पर लौटता हूँ

प्रतिज्ञा ठीक मेरी

सच बोलुंगा सच लिखुंगा

अब

सच भीतर है

और झूठ अपने जाल में

मुझे कस गया है

अस्तित्व उसी में फँस गया है

सन्नाटा बुनते हुए

सपने देखे जाते हैं

और सपना देखते

सन्नाटा भोगा जाता है

अपने को झुठलाने में

यही होता है, शायद !

__________________________

॥समझौता॥

जिन समझौतों के बीच

जीवन सँवारने की कोशिश की

उन्हीं सम्झौतों में

खो गया वह

लोगों ने समझाया था

जीवन-सुख के कँवल

समझौतों में खिलते हैं

और उनकी प्रत्यासा में

मैं कीचड़ का हो गया

मैं झुका, और झुका

झुकता ही चला गया

और पाया एक दिन

कीचड़ में आकंठ

धँसा हूँ

वर्षों की कीच-साधना में

कस गया शिकंजा समझौतों का

कसमसाई

छटपटाई जिन्दगी

थक हार सो गयी

नींद जब खुली

ढल रहा था दिन

गल रही थी उम्र

दूर-दूर तक

दुपहरी के बाद का

सन्नाटा था

और था रेगिस्तानी सफर

तब समझा,

इन सम्झौतों में

जीवन तो लुट गया

________________

॥अपेक्षाएँ॥

स्वयं से अपेक्षा थी कि गीत रचूँ

लेकिन मज्बूरियाँ ऐसी हुईं

नौकरी तलाशने लगा

अपेक्षा थी अपनी

पर्वतों की छाया में

वनपाखियों से प्यार करूँ

लेकिन राजनेता की अगुआनी में

मालाएँ गूँथने लगा

अपेक्षा थी अभाव के क्षणों को

बनाऊँ सिरजनहार कविता का

लेकिन दफ्तरी फाइलें देखने में

क्षण गुजर गये

जीवन ठहर गया

ईमानदारी से तुम तक पहुँचाऊँ

अपनी अनुभूतियाँ

अपेक्षा थी,

लेकिन झुठला गया मैं

अपने भोग,

मजबूरियों में जीने की

पीड़ा को

कविता में ढालने के बजाय

ढल गया मैं जीवन के

गद्य में

अब तो

किसी कमाऊ अवसर की

तलाश में रहता हूँ

और अपेक्षाएँ बेअहसास

किसी कोने में पड़ी है

चुपचाप

_________________________

॥मरणोन्मुख वसंत॥

मैंने देखा है वसंत को मरते

और लोग कहते हैं

वसंत जवानी पर है

कल दुख में भी हँसता था

रोता और गाता था साथ-साथ

शेली की पंक्तियाँ दुहराता वसंत में

आज सुख भी सालता है

होता नहीं अहसास वसंत का

बेअहसास वसंत अब

मृत्युबोध देता है

फूलों से रंग झड़ जायेंगे

मुरझायेंगी पंखुड़ियाँ

खुशबू दूर जायेगी

कोइ आशा अब व्यर्थ है वसंत से

यादों में उभरेगा

एकांत में वसंत अब

उसका धीरे-धीरे मरना

सहना है खामोशी से भीतर

देखा नहीं जाता दुख

वह झेलने की प्रक्रिया है

साँसों को कैद की सजा है

जीवन की पंक्ति में

अर्द्धविराम सा,

वसंत

प्रतीक्षारत है

रचनाकार पूर्णविराम देगा कब­­--

________________________

॥एक प्रेम कविता॥

आषाढ का एक दिन

अंतर्मन में तलाश है

मल्लिका की

जो किसी विलोम की बाँहों में

सुख के अवसर

ढूंढती होगी

कहीं

मेरा आनन्द-कोष

बन्द पड़ा है किसी के पास

मन उदास है

सिर्फ इसलिये कि

कापुरुष हूँ मैं

गुनाहों का देवता सा

किसी सुधि के बदले

कोई विनती या पम्मी चाहिये

सुधि मरे या जिये

किसी के लिये

मुझे क्या?

अविश्वास से

मांगता हूं शक्ति

सह सकूं, अपनी पीड़ा

किसी बहाने झुठलाउँ खुद को

अब ऐसा लगता है

सम्वेदनाएँ सिर्फ लाशें हैं

नगरपालिका की गाड़ी सा

ढो रहा हूँ जिन्हें मैं.

______________________

॥संगीत और जीवन॥

संगीत के पंखों पर

कल्पना में सैर की

देखे- वन, पर्वत

फूल, झरने, झील

बर्फीली चोटियाँ

सागर निस्सीम

भोगा छायावाद

वापस आते ही

जीवन के यथार्थ पर

प्रतीक्षारत पाया जरूरतों को

इन्द्रधनुषी इच्छाएँ

जवान होते ही मरीं

यह सिलसिला बना

और सिलसिला भी

पुराना पड़ गया

शिकायतों में

झाँकता है बचपन अब

पागल कहते हैं बुजुर्ग

हँसी उड़ाते हैं चालाक दुनियादार

पुनः

रविशंकर, वी जी जोग

चौरसिया के कैसेट की

होती है तलाश

कि आँखें बन्द करूं, देखूँ सपना

उड़ जाँऊँ संगीत के पंखों पर

किंतु

जीवन रास्ते पर ढकेल देता है

संघर्ष के लिये

संगीत खो जाता है

सपना सो जाता है.

________________

॥बीमार॥

महाविद्यालय् परिसर में

किसी सुरुचि सम्पन्न व्यक्ति ने

सरस्वती पूजा के अवसर पर

हरिप्रसाद चौरसिया का कैसेट

लगा दिया लौउड्स्पीकर पर

बाँसुरी की स्वर लहरी

लहराने लगी

राग चन्द्रकौंस

सजाने लगी

दो क्षण गुजरते न गुजरे

संगीत खो गया

राग चन्द्रकौंस सो गया

चारो ओर गहमागहमी थी

शोर था

हंसी, उल्लास की चहल्कदमी थी

किसी ने ध्यान नहीं दिया

हादसा हो गया

दुसरे एक कैसेट पर

पौप संगीत बजने लगा

वातावरन सजने लगा

हर तरफ रंग था

सुगन्ध थी

खिल्खिलाते चेहरे थे

थिरकते पाँव थे

संस्कृति लाचार थी

शिक्षा बीमार थी.

_______________________

॥बेरोजगार॥

सफर करते पाँव को

थकते देख, बैसाखी दो

फिर करो सफर की तैय्यारी

पल-घंटे

दिन-सप्ताह

मास-बरस बीत जायेंगे

ऐसे ही जिन्दगी के दिन

रीत जायेंगे

पाओगे एक दिन

फिर बिन पाथेय

आगे का रास्ता होगा

होंगी बैसाखियाँ

और थके पाँव

व्यवस्था के ठेकेदार

देंगे आदेश

चलते चलो-चरैवेति

क्योंकि पुरातन यह मंत्र है

इसी के सहारे चल रहा

देश का गणतंत्र है

वर्ष दर वर्ष गुजरते

आजादी और तंत्र

कहीं न कहीं पहुँचेंगे ही

लंगराते ही सही

सब जानते हैं

चलना दो तरह का होता है

आगे चला जाता है

मील के पत्थरों को गिनते

और गोल भी

कोल्हू के बैल की तरह

भले ही दहसत हो

अपने चूक जाने का

बिना बढे आगे

चल तो रहा है

देश प्रगती के पथ पर

भले पता न हो

मील के पत्थरों का

कुछ नहीं करते हुए

देता है व्यर्थता बोध

धमनी से चूसता है रक्त

वक्त का घूस देकर साँसों का

सिर्फ जिया जाता है

कुछ किया नहीं जाता

जिन्दगी की फाईल पर

उम्मीदों का आदेश है

इसलिये अहसास है

केस अभी जिन्दा है

बन्धा नहीं पुलिन्दा है

रेकोर्ड रूम जाने से

अभी बची है जिन्दगी

कुछ चक्कर

अभी और चल सकते हैं

क्योंकी दफ्तर आबाद है.

________________________

॥वह और मैं॥

उनसे कहा मैंने

मैं आईना हूं तुम्हारा

चेहरा देख लो

वह मुस्कुराये

देखा चेहरा तो झुँझलाये

एक दिन फिर मिले वह

कहा मैंने

पत्थर हूँ टकराओ मत

वह माने नहीं

टकराये, पछताये

अगली बार मिलने पर

मैंने कहा

सागर हूँ मैं, तैरो मत, डूबोगे

वह माने नहीं, तैरे

डूबने लगे तो घबराये

मैने यह भी कहा

तलवार की धार हूँ,

मत चलो कटोगे

वह चले

कटने लगे तो गिड़गिड़ाये

एक दिन

कहने की बारी उनकी थी

उन्होंने कुछ कहा नहीं

पत्थर उठा दे मारा

कहनी अनकहनी हो गयी

उनमें और मुझमें

यही फर्क था

वह नेता थे, मैं जनता

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॥कैफियत॥

अक्सर लोगों ने पूछा है

आज की कविता में

तल्खी है, पीड़ा है

प्रश्नों का जखीरा है, क्यों

उत्तर मैं दे सकता था

अतीत से परम्परा से

कविता का बताता सम्बन्ध

पीड़ा से

लेकिन मैं चुप रहा

कैसे समझाता

दुख होता है

कवि का अस्तित्व-कवच

इसलिये बताया नहीं

काव्य सत्य

कविता वेदना की संतान है

जीवन सत्य कि

दुख से बचा कौन इंसान है

सोचा

कैसा यह सवाल है

लोग पहचानते नहीं अब

अपना ही चेहरा

कविता के आईने में !

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॥बेचारा सच॥

सच की लड़ाई लड़ता

वह मर गया

झूठ के सहारे

दूसरा सिन्हासन चढ गया

महारथियों का महाभोज बना अभिमन्यु

अर्द्धसत्य की आड़ में

युद्ध जीत गये पाण्डव

सच भले आदर्श हो

जीवन का,

झूठ के कवच

छल की ढाल से

जीवन संग्राम में

जीत रहे हैं लोग

इसलिये भूल से भी

मत बनो कर्ण वह

जिसने अपना कवच

दान कर दिया छल को

अर्जुन की तरह

शिखंडी को ढाल बना

जीव समर जीतना

लोगों का आदर्श है

आज भी.

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एक सच यह भी

करोड़ों जिन्दगी से

करते खिलवाड़

आगे बढ जाते हैं

नेता

जनतंत्र के

गुण गाती

पीछे छूट जाती है

जनता

घिसटती है जिन्दगी

भाषणों, अश्वाषणों पर

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अंतर

खुले आकाश में

उड़ते परिन्दे

चहचहाते, चहकते हैं

अन्दिखे रह जाते हैं

बन्द कमरे में

टी.वी. के परदे पर

उड़ते परिन्दे

चहचहाते, चहकते हैं

उन्हें देख बच्चे

हंसते, किलकते हैं

दो दुनिया समानांतर है

दोनों में कितना अंतर है.

___________________

॥शारदीय स्पर्श॥

एक

दम तोड़ती इच्छाओं के साये में

जरूरतों की मार से घायल

मन को सहलाता

खुद से बतियाता

सुनसान सड़क पर टहल रहा था

अन्धेरे में, अकेले मैं

सो गयी थी शाम कब की

जग गयी थी रात

अचानक लगा जैसे

बदल गयी हो हवा

किसी अजाने स्पर्श से

सिहर गये रोम-रोम

देखा आकश

निरभ्र विभावरी में

खो गयीं आँखें

पुलकित हुआ मन

शारदीय-स्पर्श से

सरस हो गयी चेतना

उल्लास छलकने लगा पोर-पोर

रोमांस महकने लगा मौसम में

आकाश सिमट आया बाँहों में

सीमायें सभी टूटती सी लगीं

वर्षों बाद

किशोर मन जागा हो जैसे

बिम्ब उभरने लगे रोमांस के

भरने लगे प्राण

अंग- प्रत्यंग में

कौंध गया बचपन

स्मृति आलोक में

कितना था प्यार मुझे

चान्दनी से, धूप से

फूल और पत्तों से

अमराईयों की गन्ध

रची-बसी थी मन में

ऋतुएं गुजरती थीं

मन से मेर होकर

बातें मैं करता था

चाँद और तारों से

पाखियों की भाषा

बोलती थी जिह्वा

चन्दन-वन घूमती हवा

सहलातीं थी देह

पत्तों का संगीत

सुनते थे कान

पहाड़ बुलाता था

सागर नहलाता था

नदियाँ दुलराती थीं

सूरज जगाता था

क्षितिज पार आँखें

अक्सर खो जाती थीं

लौटा मैं

मुदित मन सोचता

खुद से मिलुंगा

कविता लिखुंगा आज

दो

घर पहुंचते ही

पत्नी ने पूछा-

लाये दूध बाजर से?

कब से रो रहा है मुन्ना

इशारे से कहा मैने-चुप रहो,

मानी नहीं, झुंझलाने लगी

वह बड़बड़ाने लगी

मुझे गुस्सा चढ आया

लिखने के बजाय कविता

चीखने चिल्लाने लगा

चमड़ी उधेड़ने लगा उसकी

अहसास वह मर गया

पहले जो जीवंत था

शारदीय स्पर्श का

आकाश छोटा हो गया

सरसता कहीं खो गयी

सिसकती, तड़पती रही कविता

कोने में मन के

मानसिक उत्तप में

दारुण पश्चात्ताप में

पड़ा-पड़ा सोचने लगा

क्योँ

कविता आकाश नहीं बनती

शारदीय अनुभूति

विराट नहीं बनती अब

देखते ही देखते

जीवन का रोमांस

मरने क्यों लगता है

साधनों के अभाव में?

क्या इसीलिये आज

तल्ख है कविता

जहर उगलती है

आग बरसाती है?

कई बार अपने से पूछा है

मेरे भीतर किसने

कविता को मारा है

उस अदृश्य हत्यारे को

कई बार ललकारा है

लेकिन हर बार वह

गुम हो गया है

रहस्यमय जंगल में

जंगल- जो मेरे भीतर है

बाहर है

सब जगह

मुझमें उगाया गया है

मुझे बनाया गया है

अब दुख भी चुप रहता है

खामोश सहता है

अपने अहसास

तीन

कितनी बड़ी साजिस है

व्यवस्था की, तंत्र की

नयी पीढी के खिलाफ !

रोजगार की तलाश में

थककर वह सो जाये

भले ही खो जाये

दरिन्दगी के जंगल में

या अत्मघाती बन जाये

परंतु, कुछ कर न सके

नया कुछ रच न सके

हाथ उसके कटे हों

डिग्रियों के नाम

आज के दौर में

यह जिन्दगी की हार है

व्यवस्था के दुर्ग में

गहरा अन्धकार है

करवटे बदलते हुए

कौंधता है शायद कुछ

खिड़कियों से झाँकती है

जैसे कहीं रोशनी

थके सोये लोगों में

जगने की चाहत शेष है

शरद

तुम्हारा स्वागत है

आओ

अपने स्पर्श से तुम जगाओ

जीवन के गीत.

_____________________

॥जाड़े में धूप॥

धूप

आ बैठती है

कबूतरी सी

सबेरे, सबसे पहले

कोने में कैंतीन के

आते ही कुर्सी पर

लेता हूँ उसे गोद

गुनगुने पानी में

धँसने की

होती है अनुभूति

सरकती हुई धूप

फैलती है आगे

छूट जाता है कोना

बदलते हुए कुर्सियाँ

जाता हूँ उधर

जाती है जिधर धूप

पुरानी है आदत

प्यार की धूप से

लम्बी कहानी है

चढता था बचपन में

ढेर के पुआल पर

करता था स्वागत मैं

प्यार से, चिढाते

सुनहरी धूप को

पूस के महीने में

वे दिन सुनहरे

बीत गये गिन-गिन

उम्र की डगर पर

तलाश में धूप की

भटकता रहा दर-दर

सब जगह निभाई गई

ठंडी औपचारिकताएँ

सहमें हैं धूप से रिश्ते

सहमी हो धूप जैसे

सर्द लहर में

मिलती है जहाँ कहीं

थोड़ी सी धूप

वहीं चला जाता हूं

जाने कब बादल छँटे

छितराये धूप

छाये तन-मन पर.

___________________

॥किराये का मकान॥

कमरे की

कोई खिड़की नहीं खुलती

पूरब की ओर

मैंने कभी देखा नहीं

सूरज को उगते

धूप जगाती नहीं

सहला कर, दुलरा कर

जब नींद खुलती है

दिन के कुछ घंटे

गुजर गये होते हैं

एक भय ने

जकड़ रक्खा है मुझे

टूटते छत की शहतीर

जाने कब नीची आ गिरे

और मैं दब जाउँ

अपने तमाम इंसानी रिश्तों से

गुहार है मेरी

इस कमरे की बन जाये छत

और मैं हो सकूँ निर्भय

पिछवाड़े की खिड़की

जब खोलता हूँ कभी

कचड़े से उठती है दुर्गन्ध

भन्ना देती है माथा

बन्द जब रहती है वह

बढती है ठन्ड और सीलन

घिरा रहता अन्धेरा है

दिन के उजाले में

कैसी यह यंत्रणा है

कैसा यह दंड है

थोड़ा प्रकाश, थोड़ी हवा

मिलेगी तभी जब

कचड़े की उठती दुर्गन्ध

सहना मंजूर हो

वरना यह

दिन में अन्धेरा

सीलन और ठंड है.

____________________

॥शब्द॥

शब्द

सही अर्थ के लिये

तड़प रहे है

सही सन्दर्भ की तलाश में

भटक रहे हैं

बार-बार खटक रहे हैं

श्ब्द

लोगों की जुबान से

गालियाँ बन निकल रहे हैं

परिवर्तन की कामना में

जल रहे हैं

लोग

नजर नहीं आते

आदमी

तीर तलवार बन गये हैं

एक दूसरे पर

वार बन गये हैं

शब्द

अब जुबान पर

नहीं चढते

जहर-बुझे वाण से

कमान पर

चढते हैं.

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॥बटखरा बनाम आदमी॥

अपने को तौलना

और बटखरे की अपेक्षा

कम कर उतारना

अपमान है बटखरे का

भले ही सामनेवाला

ग्राहक

ठगा जाये चुपचाप

किंतु, आज

तौलते हुए अपने को

कम कर उतारना तराजू से

सबसे बड़ी नीति है

परंतु

कम कर तौलते हुए

हर आदमी

बटखरे से

कम ही तुले

और कम से कम

तुलता जाये

तो एक दिन

सोचेगा बटखरा

क्या काम है उसका ?

जब हर आदमी

बेईमान है

तो बेचारा बटखरा

क्यों बदनाम है ?

_______________________

॥कोई जरूरी नहीं॥

कोई जरूरी नहीं

कि कविता लिखी जाये

जो लिखी जाती है

वह कविता होती है

चाहे वह पुरानी हो या समसामयिक

लेकिन जो अंलिखी है

वह कविता जिन्दगी है

जिसे या तो भोगते हैं

या जीते हैं

जिन्दगी एक पुरानी कविता है

जो सदा नवीन रहती है

प्यार में, संत्रास में

आदमी या आदमखोरों के बीच

पीपल की छाँव हो

या संगीन का साया

सुनहरी धूप हो

या ठिठुरती सर्दी

जिन्दगी का होना

एक शर्त है_ कविता होने के लिये

एक अहसास है जिन्दगी

जंगलों, खेतों से होती

कल-कारखानों तक पहुँची है

और यह आसमान तक जायेगी

लेकिन अहसास की पोशाकें बदलकर

इसे नकार नहीं सकते

मार नहीं सकते तुम

अहसास इंसानियत की रूह है जिसे

लोहे या ऐसे ही कोई कठोर अर्थ में

ढाला नहीं जा सकता

ढाँचे का सच कोई मायने नहीं रखता

अगर सच सचमुच इंसानी रूह से नावाकिफ है

ढाँचे का टूटना इंसान के

मन का दरकना नहीं है

यह सिर्फ अहसाह की पोशाक बदलना है

और यह तै करना है

कि हम रूह तक पहुँचने में

देर करने की तरकीब सोच रहे हैं

रक़्त की जुबान

अहसास से अलग नहीं होती

और रक़्त जब सड़कों पर बहता है

तो यह अनलिखी कविता

कोई महाकाव्य बनने से रह जाती है

और महाकाव्य अतीत का दरक जाता है

उसके सर्ग बिखर जाते हैं

धर्म-संस्कृति के गौरव-पुरुष

शर्म से सिर झुका

आदमी के लहु पर पाँव धरते

नजर आते हैं

और

उनकी आँखे नम रहती हैं!

____________________________

॥इतिहास सन्दर्भ:एक॥

हो गया था वह गूँगा

काट दी थी

जुबान उसकी

हालत ने और

कर दिया था सामने

इतिहास से

सम्वाद के लिये

कर सकता है

कोई बात क्या

कटी जुबान से

वह भी इतिहास जैसे

वाचाल के साथ

हजारों दास्तान हैं

सैकड़ों साल के

रहता है वह

इस दम्भ में भी

कि आनेवाला दिन

बन जायेगा अगली किस्त

उन्हीं दास्तानों की

साहस किया उसने

फिर भी

कैनवास, कूँची और

रंगों के सहारे

खींचने लगा तस्वीरें आज की

(गनीमत थी

कटे नहीं थे हाथ अभी)

उसने खींचे दायरे

दायरों के बीच

कुछ और छोटे दायरे

छींटे दिये रक़्त के

कहीं रक्खा वह

मांस के लोथड़े

कटे हाथ-पाँवों का

लगा दिया अम्बार

हवाला दिया

अपनी कटी जुबान का

उजागर किया उसने

बेरहमी हालात की

मुस्कुराया इतिहास

खलनायक सा

कुटिल मुस्कान

और रहस्यमय तरीके से

अतीत के पन्ने पलटने लगा

दिखाने लगा उसे धीरे-धीरे

उत्सुकता से

देखने लगा वह

लेकिन तुरंत उसने

बन्द कर लीं आँखें

पीड़ा और दहशत में

क्योंकि

उभर रही थी

हर पृष्ठ पर

उसकी ही बनाई

तस्वीर।

******

॥इतिहास सन्दर्भ:दो॥

प्रतिबिम्बित हैं

आईने में

कुछ चेहरे

साबुत चमकते हुए

दर्प से

कुछ चेहरे हैं

घायल

क्षत-विक्षत

रक्त-प्लावित

एक सदी से

दूसरी तक

सफर करते पाँव

लहुलुहान लगते हैं

दीखता है कहीं

ठुकी कीलें हाथ पाँवों में

पैगम्बरों के

जिससे रिसता लहू

तर-बतर कर रहा है

इंसानियत को

आज भी

महान सदियों

और हस्तियों के बीच

ताजा है

इंसान के जख्म

जो दिये हैं

दरिन्दों ने

लेकिन दमकते हैं

चेहरे वे

जख्म के फूल से

चमकते हैं बूँदें

खून और पसीने की

रौशन है उनका व्यक्तित्व

दरिन्दगी से लड़ते

नहीं हुई है बन्द

लड़ाई

जारी है

बदस्तूर

वर्तमान

दिखाता नहीं आईना

यहाँ परछाइयाँ नहीं

खड़ी हैं सामने सच्चाइयाँ

इनके चेहरे से

अतीत के दग-धब्बे मिटाना

जरूरत है

आज की।

________________________

॥करवट॥

सोया रहा वर्षों वह

पहन लिया था उसने

कवच मौन का

अपनी कायरत में

सोचता वह

सपने देखता कभी-कभार

याद दिलाता

जैसे खुद को

जिन्दा है

अभी जिन्दा है

क्योंकि सोच लेता है

सपने देख लेता है

गुजर जाते हादसे

उसके इर्द-गिर्द

उससे होकर भी

लेकिन कुम्भकर्ण वह

पड़ा-पड़ा बिस्तर पर

पूछ लेता खुद से

कभी-कभी

क्या सम्भव है कोई तरीका

पुरअसर बनाने का

इंसानियत के उसूलों को

इससे आगे

विराम ले लेती थी

उसकी चिंता

वह खोया रहता

अपने या इतिहास में

दुहराता अतीत भीतर

उसकी कायरता

बन गयी थी नियति

खुद को देखना

इतिहास के आईने में

दूबना-उतराना

अतीत के सागर में

बन गया था

शरण-स्थल उसका

रखने लगा था वह

हादसों से

अलग अपने को

अलगनी के कपड़ों सा

लेकिन

इजाजत नहीं देती जिन्दगी

वैसी लापरवाही की

एक दिन उसने

खींच लिया उसे

बाँह पकड़

अतीत के गर्त से

छीन ली रोटी

ठीक सामने से उसके

सूखा पड़ गया

उसके भीतर

पानी के अभाव में

खड़ी हो गयीं दीवारें

बाहर

और पाया वह

कैदी है वर्त्तमान का

पार किये थे उसने

जितने सैलाब खून के

बन्द कर आँखें

पी गया था

मौत की खबरें चाय के साथ

फेंकता रहा था रद्दी में

अनगिन मसले आज के

रोज-ब-रोज

अखबार के साथ

सोता रहा था बेफिक्र

मान कर मौत को दस कदम दूर

लपके सब उसकी ओर

नोचने लगे बोटियाँ

तिलमिलाया वह

रोया-चिल्लाया

उसकी चीख में फट पड़ा मौन

हरकत में आ गये हाथ पाँव

तन गयीं नसें

बरसने लगे अंगार आँखों से

अहसास हुआ उसे

लड़ने की नियति भी उसी की है

तोड़कर मोटी परतें

इतिहास की गर्द झाड़

अंगराइयाँ लेती हुई

एक नई जिन्दगी

लेने लगी करवट

________________________

॥जिजीविषा की दूब॥

एक से एक

नायाब तरीकों से

उत्पीड़ण, त्रास, यंत्रणा देकर

तब्दील कर दिया है

कुछ लोगों नें

यंत्रणा-शिविर में देश को

दुहाई देते हुए

मूल्यों, उसूलों की

हवाले किया है दरिन्दों को

करोड़ों की जिन्दगी

तंगदिली, तंगदिमागी में

आकाओं ने बान्धे हैं मंसूबे

रचा है चक्रव्यूह

जिसमें अभिमन्यु सा कोई

अंतिम दम तक

लड़कर भी

अभीशप्त है मरने को

निहत्थों पर वार करके

कराते हैं पहचान महारथी

अपने वीरत्व का

चाहते है वे जीत

किसी तरह,

जीवन नहीं

लेकिन हरी हो उठती है

दब-कुचलकर भी

जिजीविषा की दूब

जीने के लिये फिर से

____________________

॥बुद्धिजीवी:एक॥

जब तक आग

नहीं पहुंचती

हमारे घर तक

किसी के घर जलने का

अफ्सोस है हमें

लेकिन आग बुझाने का

पुख्ता इंतजाम

हमारे वश में नहीं

जब तक कोई आन्धी

नहीं हिलाती

हमारी जड़ें

किसी दरख्त के गिरने का

सदमा होता है

लेकिन रोक सकें आन्धी

यह हमारी

क्षमता से बाहर है

बाढ में बह गये घरों

मर गये लोगों के

आँकड़े पढते है हम

अखबार में

या पान की दुकानों

या कौफी हाउस में

उन आंकड़ों पर

उत्तेजित बहस करते हुए

आँसू सुखा लेते हैं

आक्रोश में

सूखे से फट पड़ी

धरती की छाती से

पानी निकालने की योजनाएँ

तैयार करते हुए

नल्कूप बिठाते हैं

फाइलों में

और बाँट लेते हैं

करोड़ों की राशि

अकाल से बचने के लिये

देश के नक्शे में

पर रही दरार पर

पुल बाँधते हैं बहसों के

संसद में

या मंचों पर बाहर

साम्प्रदायिक, जातीय दंगों पर

सार्वजनिक हैं हमारी चिंताएं

लेकिन जानते हैं सब

जब हमारी खुद की

जरूरतें जरूरी हैं

तो क्षणिक हैं

सार्वजनिक चिन्ताएं

करोड़ों की बदहाल आबादी में

हमारे हिस्से की

अपनी भी बदहाली है

और इन्हें दूर करना

लाचारी है अपनी

भ्रष्ट समझौतों ने

आदमकद आदर्शों के सामने

बौना बना दिया है हमें

*********************

॥बुद्धिजीवी:दो॥

हमारे गले तक

न पहुचे हाथ

आततायियों के

इसलिये सहलाते

आये हैं उन्हें बरसों से

अपनी कायरता में

हमनें पहनाये हैं उन्हें

धर्म, जाति

भाषा, संस्कृति की

उलझी व्याख्याओं से तैयार

बुलेटप्रुफ पोशाकें

सताता रहता है भय

कहीं हमारे ही बनाये हथियार

इस्तेमाल न कर दें वे

हमें रास्ते से हटाने के लिये

इसलिये

बुहारते हैं रस्ता उनका

निकालते हैं अर्थ वे

हमारी चुप्पी से

समझाते हैं बच्चों को

निहितार्थ सत्यमेव जयते का

नीति, उपदेश के

मान लेते हैं हक अपने

कम होते आइ क्यू

झिझकते हुए भी

पूछते हैं खुद से हम

कर सकते हैं कुछ

इंसानियत के लिये ?
______________________

॥विद्रुप॥

खुदपरस्त

सत्ता-मदान्ध

बेहूदे दरिन्दों के

गिरफ्त में छटपटाता

वह चीखता चिल्लाता है

जिन्दगी की बेहूदगियों पर

और बेहूदगियाँ चश्पाँ हो जाती है

उसके चेहरे पर

अजनबी लगता है वह

उनके बीच, एक विदूषक

जिससे करते हैं वे

अपना दिलबहलाव

उन्होंने ही

चूसा है रक्त

उसकी धमनियों, शिराओं से

उसकी हड्डियों पर हैं निशान

उनके आततायी दाँतों के

उसकी पीठ बनाकर पाँवदान

वे चढते हैं सिन्हासन पर

छीन लेते हैं

उसके सपने

हजम कर जाते हैं

उसका हक़

और इत्मिनान से

मुस्काते, बतियाते

देखते हैं तमाशा

उसके चीखने-चिल्लाने का

आ रही है मौत

दबे पाँव, धीरे-धीरे

उसके करीब

नृशंस षड़यंत्र में

लेकिन

हरे हैं पेड़ अभी

उसके आस-पास

जीवित है घास

आक्षितिज फैली

धरती की हरीतिमा

उसकी आँखों में

है अभी

है अभी जिजीविषा का विस्तार

पर्वत से सागर तक

उसकी आँखों में

अभी झाँकता है

सूरज संकल्प का

है अभी विश्वास

वह एक दिन

लेगा हिसाब

उन दरिन्दों से

अपनें छले गये क्षणों का

और नोंच फेंकेगा

बेहूदगियाँ

अपने चेहरे से।

____________________

॥अँगुलियों का इस्तेमाल॥

अंगुलियों को

इबारत बना

कागज पर उतारना

आया उसे

लेकिन बतौर एक कवि-मित्र

इन्हे मुक्का बना

व्यवस्था की छाती तोड़

उसका लहू पीना

नहीं आया उसे

अफ्सोस है इसका

मुट्ठियाँ भींच

अक्सर दे मारी है

उसने टेबिलों पर

नपुंसक क्रोध में

लेकिन इनका इस्तेमाल

नहीं कर पाया

दरिन्दों के जबड़ों पर

अफसोस है इसका

तुम कोई भी

क्यों न हो आततायी

उसकी अंगुलियाँ

पहुँचेगी जरूर एक दिन

तुम्हारे गले तक

इसका अह्सास

है हमें ।

__________________________

॥कविता की त्रासदी॥

यह जरूरी नहीं

लिखी ही जाय कविता

और समय के पृष्ठ पर

टाँक उसे, इतराये कवि

इतने से काम पर इतराना

कर्मरत लोगों की नियति का

मजाक उड़ाना है

सपनों के

खन्डहर होते जाने के दौर में

काव्य-स्वप्न

लगा है लगने मरिचिका सा

झुठला कर कटु दंश

जिन्दगी के

कविता के गोद में

दुबकना

कई कारणों से अब

लगने लगा है

जुगुत्सुक

हालात ऐसे हैं आज

दिन भर

अगली पीढी को

तैयार करता शिक्षक

शाम होते

सुनता है फटकार

सचिव का

फिर भी सहलाता है

उसके तलवे

चाटता है जूते

भीतर ही भीतर

गलियाता, भुनभुनाता

लौटता है घर

बीवी की देह पर

बर्बर जुबान में

सहमें सकुचाये बच्चे

गुमसुम, सरापते हैं उसे

कविता

सम्भालने लगती है

तार-तार कपड़े

उसकी बीवी के

दिन भर मजूरी करती

परबतिया

शाम ढले लौटती है घर

टिमटिमाते दिये की लौ में

बैठती है सेंकने रोटी

धुँधुँआती आँच में

हर आती है उसकी आँखें

सोचकर

आज भी बच्चे

खा नहीं पाएँगे भरपेट

काट ली है दिहाड़ी

ठेकेदार ने

किरासन की कमी से

टिमटिमाता दिया भी

बुझने लगती है

कविता बुझ रही हो जैसे

कोई जरूरी नहीं

कविता कागज पर ही उतरे

चलती है अब वह

कंकरीट की सड़क पर

छिले होए हैं उसके पाँव

रिस रहा होता है

जिनसे खून

ईंट होती है कविता

गिरती है

फिसलकर

तो ठेकेदार

सहारा देने के बजाय

तलाशता है शृंगार

उसकी उघड़ी देह में

कविता अब

महानगर की कॉम-गर्ल का

फोन नम्बर है

जुड़ा है जो

किसी सेठ

नेता या दादा के नम्बर से

शाम होते ही कविता

घुटती, सिसकती

पसर जाती है

अन्धेरे में

अब तो फैलता अन्धेरा

गाँव से महानगर तक

जाति, धर्म, के नाम पर

घेरता नजर आता है देश को

गुम हो गयी है कविता

अन्धेरे में

कविता

नहीं फूटती अब

कंठ से गीत बन

क्योंकि

गिरवी हैं आवाजें

दहशत को

वे नारे लगाती हैं

या चीख बन जाती हैं

कहीं बलात्कार भोगती

रमिया के कंठ की

चीत्कार है कविता

जरूरी है अब

कविता को निकालकर बाहर

अन्धेरे से

उसके चीत्कार को बदलना

संगीत में

उसको

कवच और शम्शीर बनाकर

जिन्दगी में लड़ना

जरूरत है आज

कवि का

हड्डियाँ गलाकर

सूरज सा जलना

कविता को रोशनी में बदलना।

___________________________

॥वसंत को किसने देखा॥

आया वह चुपके से

दबे पाँव

पतझर के कैनवास पर

कूचियाँ फेरने लगा

बिखेरने लगा रंग

निकल आये पेड़ों पर

नये पत्ते कोमल-मसृण

अहसास लिये नवजीवन का

खिल उठे फूल

टेसू, अमलतास

गुलमोहर के

लद गयीं मंजरियों से

टहनियाँ आम की

महुआ फुलाया-गन्धाया

मदहोश करने लगा

खिल गये बेला,गुलाब

मलयानिल-स्पर्श से

महक उठी चान्दनी चैत की

गेहूँ की बालियों से

उड़ने लगी गन्ध गीत की

गुदगुदा गया मन

वासंती छुअन

बीती कविताओं के

कितने वसंत-बिम्ब

उभर कर छा गये मन पर

इतना कुछ करते-कराते

सँवारते-सजाते

चुपके से

चला गया वसंत

लोगों को देखा

उदास हैं वसंत में

नकारते हों जैसे

अहसास वसंत का

मैने टहोका

तो कहने लगे लोग

भोगते रहे हम तो

दहशत भरी रातें

आशंकाग्रस्त दिन

टटोलते रहे अपनी जेबें

बहस करते हुए बजट पर

सोचते रहे, कैसी होगी

अगली होली, दिवाली

ऐसी मनःस्थिति में

देखा किसने वसंत को

_______________________

॥बहती रहो नदी॥

बहती रहो नदी

सींचती रहो धरती

दूर-दूर तक जाओ

मेरे भीतर भी बहो

जब कभी

हो जाती हो ओझल आँखों से

गुम हो जाती है

जिन्दगी की आर्द्रता

चलती आँधी धूल की

तड़पता रह जाता हूँ मैं

रेगिस्तानी प्यास सा

जब रहती हो आस-पास

बिछी रहती है

दूर तक हरी घास

हरे रहते हैं पेड़

लहलहाते पौधे

उल्लसित हो जाता हूँ ऐसा

लगता है

खिल उठे हों मन में फूल

आ गये हों बाँहों में बादल

जग गया हो जैसे रोमांस

चान्दनी के चन्दंस्पर्श में

घुटती हुई जिन्दगी

लेने लगती है साँस

फिर से उन्मुक्त

शाश्वत हो नदी तुम

अमृत है तुम्हारी धारा

बहो, बहती रहो

सींचती रहो जिंदगी।

_________________________

॥नहीं बच पाओगे॥

नहीं

तुम नहीं बच पाओगे कवि

जब इतने कोमल

कमजोर हो

तो वैसे भी

होने का अधिकार

बनता नहीं तुम्हारा

प्रकृति तुम्हारा चुनाव

नहीं कर सकती

नहीं सह सकती वह

कमजोरी

यह तो

जानते हो तुम भी

कितना कुछ मिटता है

सिर्फ एक बनने में

एक का बनना भी

परिणति है संघर्ष की

नियम है प्रकृति का

वैज्ञानिक बना दिया डार्विन ने

इस प्राकृतिक सच को

वैसे पहले भी

देखा था लोगों ने

वटवृक्ष की छाया में

पीले पिलपिले पौधों को

अपनी मौत भोगते

संघर्ष के इस बीहड़ में

बचायेगा कौन

तुम्हारे कोमल-मसृण

अस्तित्व को ?

बान्ध नहीं पाओगे कवि

स्वप्निल-रेशम रज्जुओं से

वट-वृक्ष की छाया

हो जाओगे लहु-लुहान

कँटीली राहों पर जीवन के

गल जायेगी तुम्हारी कोमलता

बर्फ-सी

समस्याओं की आँच में

हो गयी हैं सड़कें पथरीली

नहीं है कहीं मखमली घास

नहीं चल पाओगे अब

कमल-कोमल पैरों से

रिश्तों में

धुँधुआती सच्चाई है

स्वार्थ की

हो गया है आदमी

बर्बर

तन गया है बन्दूक सा

एक दूसरे पर

कैसे इन्हे तुम प्यार सिखाओगे

इसीलिये कहता हूँ कवि

बदलो यह जीवन कोमल

चट्टानी इरादों से

भड़कने दो आग मन में

चट्टान-सी छाती

और लोहे से हाथ-पाँव

जरूरी है अब

जीवन के लिये

____________________________

॥दुश्मन॥

कविता

दुश्मन है जिनकी

वे फेंकते हैं शब्द

पत्थरों के बेजान

टुकड़ों की तरह

उसकी ओर वापस

जिन्हें दिये थे प्राण

अर्थ के

कविता नें

सम्वेदना, भावना, अनुभूति

नहीं थे शब्द केवल

न हैं अब भी

ये परिचित नाम हैं

मानवीय सन्दर्भों के

लेकिन

इनके अर्थ

खो गये हैं आज

पुरुष पुङवों के जंगल में

इनकी एकनिष्ठा

पवित्रता, निश्छलता का

उड़ाया गया है मजाक

आज के पुरुष-पुंगवों के लिये

ईमानदारी और सच्चाई

लाचारी के पर्याय हैं

सहती अपमान कविता भी

स्त्री होने का,

स्त्रीवाची

इन शब्दों की तरह

प्रतीक्षा है कविता को

समय बदलने का

कि पूछे वह एक दिन

पुरुष-पुंगवों से

क्या थे वे, गर्भ में

कितने शक्तिवान थे

पालने में झुलते

लोड़ियाँ सुनते

अंगुली पकड़ जब घुटनों से

उठाया गया था

पैरों पर चलना सिखाया गया था

घोंट सकती थी स्त्री गला उनका

इतने वे कोमल कमजोर थे

लेकिन उसने पाला था

आंचल में उन्हें ममता से

अमृत बना पिलाया था अपना लहू

इसीलिये आज क्या

उसे अपमानित करने का

अधिकार है पुरुष को?

धरती क्या सचमुच

अब रही नहीं माता

और उसके बेटे

जब चाहें, जहाँ चाहें

कर सकते हैं बलात्कार उससे

सिर्फ अपनी सत्ता-लिप्सा के लिये

और सारे सार्थक शब्द

कविता के

लौटाये जा सकते हैं उसे ?

______________________

॥संकल्प॥

लिखना है

हाँ, अभी लिखना है

लिखते हुए

होता चल रहा है यह अहसास

कि लिखा नहीं अभी वह

जिसके लिये लिये थे कोरे सफे

उठायी थी कलम

शोर-शराबें में दर्द के गीत

कोलाहल में घुटता संगीत

बेबसी, लाचारों की पुकार

करोड़ों लोगों की खामोश चीत्कार

कहाँ सुना पायी है कलम अभी

वो हाथ जो बोते हैं बीज

दरिन्दगी के, मनुष्य के मन में

काटते हैं फसल विद्वेश-वैसम्य की

कहाँ काट पायी है उन्हें कलम अभी

मनुष्य के मुखौटों में भेड़ियों की इलाकेबन्दी

छोटे से छोटा खिंचे उनके

दायरों के विरुद्ध

कहाँ हो पायी है आदमकद कलम अभी

कहाँ उकेरा है सबकी पीड़ा

सबका सच

कहाँ उगा पायी है सपने कलम अभी

इंसानियत की मुकम्मल तस्वीर

बनाने के लिये

हजारों वर्षों की सार्थक कोशिश में

अपना भी छोटा सा

हस्ताक्षर करना है ।

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